प्रेमचंद की धर्म-दृष्टि और समाज
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| फ़रीद अहमद |
धर्म का अस्ल अर्थ —इंसानियत,बराबरी, न्याय, दया और सेवा होता है, अगर धर्म इंसान को इंसान से अलग कर दे, जाति और मज़हब के नाम पर बाँट दे, या किसी के साथ अन्याय करे तो, वह धर्म अपनी असली भावना से भटक जाता है।इसलिए प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में धर्म की आलोचना नहीं की, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, पाखंड और भेदभाव की आलोचना की। उन्होंने यह दिखाया कि ईश्वर किसी एक जाति, वर्ग या धर्म का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का है।
प्रेमचंद हिंदी-उर्दू साहित्य के ऐसे महान कथाकार हैं जिन्होंने अपने साहित्य में आम इंसान की ज़िंदगी, उसके दुख-दर्द, संघर्ष, गरीबी, अन्याय और सामाजिक समस्याओं को बहुत सच्चाई के साथ पेश किया। उनकी कहानियाँ केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखी गईं, बल्कि समाज को सोचने और बदलने की प्रेरणा देने के लिए लिखी गईं। उन्होंने किसान, मज़दूर, दलित, स्त्री, ग़रीब और समाज के दबे-कुचले लोगों को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया।
प्रेमचंद के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका धार्मिक बोध है। लेकिन उनका धर्म कर्मकांड, बाहरी दिखावे या अंधविश्वास का धर्म नहीं है। उनके लिए धर्म का असली अर्थ था—इंसानियत, बराबरी, न्याय, दया और सेवा। वे मानते थे कि अगर धर्म इंसान को इंसान से अलग कर दे, जाति और मज़हब के नाम पर बाँट दे, या किसी के साथ अन्याय करे, तो वह धर्म अपनी असली भावना से भटक जाता है।
इसलिए प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में धर्म की आलोचना नहीं की, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, पाखंड और भेदभाव की आलोचना की। उन्होंने यह दिखाया कि ईश्वर किसी एक जाति, वर्ग या धर्म का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का है।
प्रेमचंद का समय भारत के इतिहास का बहुत बड़ा बदलाव का समय था। एक ओर अंग्रेज़ों का शासन था, दूसरी ओर आज़ादी की लड़ाई चल रही थी। समाज में जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच, धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याएँ भी मौजूद थीं। इसी समय आर्य समाज, ब्रह्म समाज, खिलाफ़त आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन जैसी कई सामाजिक और राजनीतिक धाराएँ भी सक्रिय थीं।
इन परिस्थितियों का प्रभाव प्रेमचंद की सोच पर भी पड़ा। उन्होंने धर्म को समाज से अलग नहीं माना, लेकिन यह भी कहा कि धर्म का इस्तेमाल किसी इंसान को दबाने या उसका शोषण करने के लिए नहीं होना चाहिए।
उनके लिए धर्म का सबसे बड़ा उद्देश्य था—इंसान को अच्छा इंसान बनाना, समाज में बराबरी और न्याय कायम करना, गरीब और कमज़ोर लोगों की मदद करना, जाति और मज़हब के नाम पर नफ़रत खत्म करना,इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानना। यही कारण है कि प्रेमचंद की कहानियों में मंदिर, मस्जिद, पंडित, मुल्ला, ठाकुर, दलित और गरीब सभी आते हैं, लेकिन कहानी का केंद्र हमेशा इंसान होता है।
कुछ आलोचकों ने लिखा है कि प्रेमचंद धर्म में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन उनकी रचनाओं को ध्यान से पढ़ने पर यह बात पूरी तरह सही नहीं लगती। प्रेमचंद धर्म के विरोधी नहीं थे। वे उस धर्म के विरोधी थे जो इंसान को बाँटे, डराए या उसका शोषण करे।
उनका मानना था कि जब धर्म का इस्तेमाल सत्ता, जाति या पैसे के लिए होने लगता है, तब उसकी असली भावना खत्म हो जाती है।
प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक "प्रेमचंद : घर में" में एक बातचीत का उल्लेख किया है। उन्होंने प्रेमचंद से पूछा—
"आप राम को मानते हैं या रहीम को?"
प्रेमचंद ने उत्तर दिया—
"मेरे लिए राम, रहीम, बुद्ध और ईसा सभी श्रद्धा के पात्र हैं। मैं सबसे पहले इंसान को मानता हूँ।"
यह छोटा-सा उत्तर प्रेमचंद की पूरी धार्मिक सोच को समझा देता है। वे किसी एक धर्म के समर्थक नहीं थे, बल्कि इंसानियत के समर्थक थे।
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी "मंदिर" धार्मिक भेदभाव पर बहुत गहरा सवाल उठाती है। कहानी की मुख्य पात्र सुखिया एक दलित स्त्री है। उसका बेटा बहुत बीमार है। वह भगवान से अपने बेटे की जान बचाने की प्रार्थना करने के लिए मंदिर जाना चाहती है। लेकिन मंदिर का पुजारी उसे अंदर जाने नहीं देता क्योंकि वह अछूत मानी जाती है। सुखिया के मन में एक ऐसा सवाल उठता है जो पूरी धार्मिक व्यवस्था पर चोट करता है—
"ठाकुरजी क्या उन्हीं के हैं? हम गरीबों का उनसे कोई नाता नहीं?"
यह प्रश्न केवल सुखिया का नहीं है। यह उन लाखों लोगों का प्रश्न है जिन्हें सदियों तक मंदिरों और धार्मिक स्थानों से दूर रखा गया। पुजारी पूजा करने देने के बजाय उससे एक रुपया लेकर ताबीज दे देता है। लेकिन उसके बेटे की हालत और बिगड़ जाती है। अंत में सुखिया मंदिर पहुँचती है, लेकिन वहाँ मौजूद लोग उसे पीटना शुरू कर देते हैं। उसी मारपीट के दौरान उसका बेटा उसके हाथों में दम तोड़ देता है।
इसके बाद सुखिया का दर्द भरा विरोध कहानी का सबसे प्रभावशाली हिस्सा बन जाता है। वह कहती है—
"मेरे छू लेने से ठाकुरजी अपवित्र हो जाएँगे? पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है, खुद लोहा नहीं बन जाता।"
यह संवाद प्रेमचंद की धार्मिक सोच का सबसे बड़ा बयान है। वे यह कहना चाहते हैं कि भगवान किसी जाति की जागीर नहीं हैं। अगर भगवान सबके हैं, तो मंदिर भी सबके होने चाहिए।
इस कहानी में प्रेमचंद ने धर्म की नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर बने ऊँच-नीच के भेदभाव की आलोचना की है।
प्रेमचंद की दूसरी प्रसिद्ध कहानी "ठाकुर का कुआँ" भी धार्मिक और सामाजिक भेदभाव पर आधारित है। कहानी की नायिका गंगी का पति बीमार है। घर का पानी गंदा हो चुका है। पास ही ठाकुर का कुआँ है, लेकिन वहाँ से पानी लेने की इजाज़त नहीं है क्योंकि गंगी दलित है।रात के अँधेरे में वह चोरी-छिपे पानी लेने जाती है। उसके मन में बार-बार डर आता है कि अगर किसी ने देख लिया तो क्या होगा?
प्रेमचंद यहाँ कोई लंबा वक्तव्य नहीं देते। केवल गंगी का डर, उसकी मजबूरी और उसकी चुप्पी ही पूरे समाज की तस्वीर सामने रख देती है।
यह कहानी केवल पानी की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है जहाँ इंसान की कीमत उसकी जाति से तय होती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह सवाल उठाते हैं कि अगर पानी, मंदिर और भगवान तक पहुँच भी जाति देखकर तय होगी, तो फिर धर्म का असली उद्देश्य क्या रह जाएगा?
प्रेमचंद की कहानी 'सद्गति' भारतीय समाज में जाति और धर्म के नाम पर होने वाले शोषण का सबसे प्रभावशाली चित्रण है। कहानी का मुख्य पात्र दुखी चमार है। वह अपनी बेटी के विवाह के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने पंडित घासीराम के घर जाता है। पंडित उससे कहता है कि पहले कुछ काम कर दो, फिर मुहूर्त बता दूँगा।
दुखी सुबह से भूखा-प्यासा पंडित के घर लकड़ी काटता है, आँगन साफ करता है और दूसरे काम करता रहता है। वह इतना थक जाता है कि लकड़ी की बड़ी गाँठ काटते-काटते वहीं गिर पड़ता है और उसकी मृत्यु हो जाती है।
कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस दुखी से जीवित रहते हुए बिना मजदूरी के कठोर काम कराया गया, उसी दुखी के मरने के बाद पंडित उसके शव को छूने से भी डरता है। उसे चिंता इस बात की नहीं होती कि एक इंसान मर गया, बल्कि इस बात की होती है कि कहीं उसका धर्म भ्रष्ट न हो जाए।
प्रेमचंद यहाँ बिना किसी संकोच के यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि धर्म किसी भूखे और गरीब इंसान के श्रम का शोषण करे और उसकी मृत्यु पर भी दया न दिखाए, तो वह कैसा धर्म है?
दुखी का चरित्र भारतीय समाज के उस करोड़ों मेहनतकश वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने सदियों तक धर्म और जाति के नाम पर अन्याय सहा। दूसरी ओर पंडित घासीराम उस पुरोहितवादी व्यवस्था का प्रतीक है, जिसने धर्म की आड़ में सामाजिक और आर्थिक दोनों प्रकार का लाभ उठाया।
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मृत्यु की कथा नहीं है, बल्कि उस संवेदना की मृत्यु की कहानी है, जिसे धर्म का आधार होना चाहिए था।
प्रेमचंद की कहानी 'सवा सेर गेहूँ' यह बताती है कि अंधविश्वास और धार्मिक भय किस तरह गरीब लोगों के आर्थिक शोषण का कारण बनते हैं।कहानी में शंकर सीधा-सादा और मेहनती किसान है। वह धर्म पर विश्वास करता है, लेकिन उसका यही विश्वास कुछ लोगों के लिए कमाई का साधन बन जाता है। धार्मिक कर्मकांडों, पाप-पुण्य और भय का ऐसा वातावरण बनाया जाता है कि शंकर अपनी मेहनत की कमाई भी दूसरों के हाथों गंवा देता है।
प्रेमचंद यहाँ यह कहना चाहते हैं कि जब धर्म ज्ञान और विवेक देने के बजाय डर पैदा करने लगे, तब उसका लाभ केवल वे लोग उठाते हैं जो धर्म की व्याख्या अपने हित में करते हैं।
शंकर का शोषण केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि मानसिक भी है। वह हर बात को धर्म का आदेश समझकर स्वीकार कर लेता है। यही कारण है कि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ नहीं उठा पाता।
इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि अशिक्षा और अंधविश्वास मिलकर गरीबों को और अधिक कमजोर बना देते हैं। धर्म का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि इंसान को सही और गलत का विवेक देना है।
प्रेमचंद की कहानी 'खून-ए-सफ़ेद' धार्मिक पहचान और पारिवारिक संबंधों के बीच पैदा होने वाले संघर्ष को बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।कहानी का पात्र साधो बचपन में अकाल के समय मिशनरियों के साथ चला जाता है। वर्षों बाद जब वह अपने माता-पिता के पास लौटता है, तो उसके मन में केवल एक इच्छा होती है—अपने परिवार के बीच रहने की। वह अपने माता-पिता से कहता है—
"माता-पिता! मुझसे जो भूल हुई, उसे माफ़ कर दीजिए। मैंने बहुत दुःख झेले हैं। अब मुझे अपने पास रख लीजिए।"
साधो की यह पुकार किसी धर्म के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रेम के लिए है। लेकिन गाँव की बिरादरी उसके लौटने को स्वीकार नहीं करती। कारण केवल इतना है कि वह ईसाइयों के बीच रहा है।
बिरादरी का एक व्यक्ति कहता है कि अब उसे समाज में पहले जैसा स्थान नहीं मिल सकता।
यहाँ प्रेमचंद एक बहुत बड़ा सवाल उठाते हैं—क्या धर्म इंसान को उसके अपने माँ-बाप से भी अलग कर सकता है? क्या धार्मिक पहचान खून के रिश्तों से भी बड़ी हो सकती है?
प्रेमचंद का उत्तर स्पष्ट है। उनके लिए इंसानियत और रिश्तों का मूल्य किसी भी धार्मिक पहचान से बड़ा है।
राह-ए-नजात' में प्रेमचंद धार्मिक अंधविश्वास और सामाजिक चालबाज़ियों का गहरा चित्रण करते हैं।
कहानी के दो पात्र—बुद्धू और झींगुर—एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हैं। दोनों एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते रहते हैं। झींगुर जानता है कि गाँव में धर्म का कितना प्रभाव है। इसलिए वह धार्मिक मान्यताओं का सहारा लेकर बुद्धू को फँसाने की योजना बनाता है।
एक बछिया की मृत्यु का दोष बुद्धू पर डाल दिया जाता है। गाँव के पंडित और ब्राह्मण बिना पूरी सच्चाई जाने उसे 'गौ-हत्या' का दोषी ठहरा देते हैं।
एक ब्राह्मण कहता है—
"शास्त्रों में इसे महापाप कहा गया है। गौ-हत्या ब्राह्मण-हत्या से कम नहीं।"
इसके बाद बुद्धू को तरह-तरह के प्रायश्चित करने पड़ते हैं। उसकी जमा-पूँजी खत्म हो जाती है, लेकिन कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता कि वह सचमुच दोषी भी है या नहीं।
प्रेमचंद इस कहानी में बताते हैं कि जब धर्म का निर्णय न्याय और सच्चाई के बजाय अफवाह, अंधविश्वास और स्वार्थ के आधार पर होने लगे, तब निर्दोष लोग सबसे अधिक पीड़ित होते हैं।
इन सभी कहानियों को साथ रखकर देखें तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि प्रेमचंद धर्म को समाप्त करना नहीं चाहते थे, ना ही वो धर्म के विरोधी थे। प्रेम चंद तो धर्म को उसकी असली जगह पर वापस लाना चाहते थे। प्रेम चंद मानना है कि धर्म का उद्देश्य इंसान को बाँटना नहीं, जोड़ना है, पूजा-पाठ से बड़ा काम किसी दुखी की मदद करना है, जाति और छुआछूत धर्म नहीं, सामाजिक बुराइयाँ हैं, भगवान किसी एक जाति या वर्ग के नहीं, सबके हैं और जो धर्म इंसाफ़, बराबरी और करुणा नहीं सिखाता, वह अपनी मूल भावना से भटक जाता है।
यही कारण है कि प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं। वे हमें याद दिलाती हैं कि धर्म की सबसे बड़ी पहचान मंदिर, मस्जिद, पूजा या कर्मकांड नहीं, बल्कि इंसान के प्रति प्रेम, सम्मान और न्याय है।



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