18 ज़िल-हिज्जी 10 हिजरी, जब रसूलुल्लाह ﷺ अपनी ज़िंदगी के आख़िरी हज से वापस तशरीफ़ ला रहे थे, तब तपते हुए सहरा की गरम फ़िज़ाओं में एक मुक़ाम ऐसा भी आया जहाँ इतिहास ठहर गया। तक़रीबन एक लाख से ज़्यादा सहाबा की मौजूदगी में रसूलुल्लाह ﷺ ने क़ाफ़िले को रुकवाया, पीछे आने वालों का इंतज़ार किया और जो आगे निकल चुके थे उन्हें वापस बुलाया गया। फिर ऊँटों की काठियों से एक बुलंद मिंबर तैयार किया गया। मिंबर पर तशरीफ लाकर रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया-
“मैं तुम में दो भारी चीज़ें छोड़ जा रहा हूँ — अल्लाह की किताब और मेरी अहल-ए-बैत।”
यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं था, बल्कि उम्मत के मुस्तक़बिल के लिए एक रोशन वसीयत और रहनुमाई का पैग़ाम था। एक जानिब कुरआन — जो क़यामत तक इंसानियत के लिए हिदायत, नूर और रहमत का सरचश्मा है, और दूसरी जानिब अहल-ए-बैत — जिनकी ज़िंदगियाँ रसूलुल्लाह ﷺ के अख़लाक़, इल्म, सब्र, तक़वा और दीनदारी और कुर्बानियों की ज़िंदा नमूना हैं।
सहाबी-ए-रसूल ﷺ हज़रत ज़ैद बिन अरकम रिवायत करते हैं कि- रसूलुल्लाह ﷺ ने मक्का और मदीना के दरमियान “ख़ुम” नामी मुक़ाम पर हमें ख़ुत्बा दिया।
आपने अल्लाह तआला की हम्द व सना बयान फ़रमाई, नसीहत की और फिर
इरशाद फ़रमाया-
“ऐ लोगो! आगाह रहो, मैं भी एक इंसान
हूँ। क़रीब है कि मेरे रब का पैग़ाम लाने वाला (मौत का फ़रिश्ता) आए और मैं उसकी
दावत क़ुबूल कर लूँ। मैं तुम्हारे दरमियान दो भारी और क़ीमती चीज़ें छोड़कर जा रहा
हूँ। उनमें पहली अल्लाह की किताब है, जिसमें हिदायत और
नूर है। पस तुम अल्लाह की किताब को मज़बूती से थामे रखना और उसे पकड़कर रखना।”
फिर आप रसूलुल्लाह ﷺ ने कुरआन को मज़बूती से पकड़ने की तरग़ीब दी और उसके बाद फ़रमाया:
“और दूसरी चीज़ मेरी अहल-ए-बैत है। मैं तुम्हें अपनी अहल-ए-बैत के बारे में
अल्लाह को याद दिलाता हूँ। मैं तुम्हें अपने अहल-ए-बैत के बारे में अल्लाह को याद
दिलाता हूँ। मैं तुम्हें अपने अहल-ए-बैत के बारे में अल्लाह को याद दिलाता हूँ।” 1
अहल-ए-बैत के बारे में तीन बार ताकीद करके रसूलुल्लाह ﷺ ने उम्मत को यह पैग़ाम दिया कि न सिर्फ़ कुरआन से अपना रिश्ता मज़बूत रखा
जाए, बल्कि आपके पाक घराने का एहतराम, मोहब्बत और उनके हुक़ूक़ का भी
ख़याल रखा जाए। यही वजह है कि यह रिवायत, जिसे बाद में हदीस-ए-सक़लैन के
नाम से जाना गया, इस्लामी तारीख़, इल्म और फ़िक्र में एक ख़ास मक़ाम रखती है।
हदीस-ए-सक़लैन में रसूलुल्लाह ﷺ ने जिन दो चीज़ों को उम्मत के लिए अमानत और रहनुमाई का ज़रिया बताया, उनमें पहली किताबुल्लाह और दूसरी अहल-ए-बैत हैं। यह इरशाद अपने अंदर एक
सजीदा पैग़ाम रखता है कि उम्मत की सोच, दीनदारी और रूहानी
रहनुमाई का रिश्ता सिर्फ़ एक किताब से नहीं, बल्कि उस किताब को
समझने, उस पर अमल करने और उसे अपनी ज़िंदगी में उतारने वाले किरदारों से भी जुड़ा
हुआ है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने
अपनी वसीयत में सबसे पहले कुरआन का ज़िक्र फ़रमाया। यह इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा
है कि इस्लाम में सबसे ऊँचा मुक़ाम अल्लाह की किताब को हासिल है। कुरआन सिर्फ़ एक
मज़हबी किताब नहीं, बल्कि इंसानी
ज़िंदगी के हर हिस्से के लिए हिदायत का ज़रिया है। इसमें अक़ीदा, इबादत, अख़लाक़, समाज, इंसाफ़ और इंसानी
रिश्तों तक के बुनियादी उसूल मौजूद हैं।
हदीस-ए-सक़लैन में कुरआन के बाद अहल-ए-बैत का ज़िक्र आना अहल-ए-बैत की
अज़मत, अहमियत और उम्मत में अहल-ए-बैत के मुक़ाम को दिखाता है। रसूलुल्लाह ﷺ ने सिर्फ़ अहल-ए-बैत नाम लेकर बात ख़त्म नहीं की, बल्कि तीन बार ताकीद फ़रमाई: “मैं
तुम्हें अपने अहल-ए-बैत के बारे में अल्लाह को याद दिलाता हूँ।” यह बार-बार कहना
अपने अंदर गहरा मतलब रखता है कि अहल-ए-बैत से मोहब्बत, उनका एहतराम, उनके हुक़ूक़ का
ख़याल और उनके साथ अच्छा बर्ताव उम्मत की अख़लाक़ी और दीनदाराना ज़िम्मेदारी है और
अल्लाह के दीन का एक अहम हिस्सा है।
अहल-ए-बैत की अज़मत सिर्फ़ रिश्तेदारी की वजह से ही नहीं, बल्कि उनके इल्म, तक़वा, सब्र, इबादत, कुर्बानी और दीन की ख़िदमत की वजह से भी है। मौला अली عَلَيْهِ ٱلسَّلَامُ का इल्म और इंसाफ़, हज़रत फ़ातिमा عَلَيْهِ ٱلسَّلَامُ की पाकीज़गी, इमाम हसन عَلَيْهِ ٱلسَّلَامُ का सब्र वा सुल्ह और इमाम हुसैन عَلَيْهِ ٱلسَّلَامُ की कुर्बानी इस्लामी तारीख़ के ऐसे रोशन बाब हैं, जो हर दौर में उम्मत को अच्छे अख़लाक़, मज़बूती और हक़ पर
डटे रहने और बातिल की पहचान का सबक़ देते हैं।
हदीस-ए-सक़लैन में इन दोनों चीज़ों का एक साथ ज़िक्र यह भी बताता है कि दीन
सिर्फ़ किताबों और अल्फ़ाज़ का नाम नहीं, बल्कि अमल और
किरदार का नाम है। कुरआन उसूल देता है, जबकि अहल-ए-बैत उन
उसूलों को अपनी ज़िंदगी में करके दिखाते हैं। कुरआन इंसान को रास्ता दिखाता है और
अहल-ए-बैत उस रास्ते पर चलने का तरीका सिखाते हैं। यही वजह है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इन दोनों को एक साथ बयान करके उम्मत को यह पैग़ाम दिया कि इल्म, अमल, मोहब्बत और अच्छे
अख़लाक़,
इन्हीं के साथ दीन की मुकम्मल तस्वीर सामने आती है।
रिवायत- “किताबुल्लाह और
मेरी सुन्नत” की सनद पर एक नज़र
एक
मशहूर रिवायत है, जिसे खूब बयान किया
जाता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने
फ़रमाया-
“मैं दो चीज़ें छोड़कर जा रहा
हूँ- अल्लाह ﷻ की किताब और मेरी सुन्नत।”
यह बात गौर करने की है कि अहल-ए-सुन्नत की कुतुब-ए-सित्तह यानी हदीस की 6
मोतबर किताबों में से किसी में भी “अल्लाह ﷻ की किताब और मेरी सुन्नत” वाली हदीस मौजूद नहीं है। सबसे पहले यह रिवायत
इमाम मालिक की मुवत्ता में फ़िर सीरत
इब्न हिशाम में
कुछ लफ़्ज़ी इख़्तिलाफ़ के साथ आयी है। मगर इन दोनों किताबों में इस रिवायत की कोई
मुकम्मल सनद मौजूद नहीं है। इसके अलावा यह रिवायत हाकिम नैशापुरी ने अल-मुस्तद्रक में
दो सनद के साथ नक़्ल की है जिसके रावी ज़ईफ़ हैं।
इस रिवायत के रवियों
में इस्माईल बिन अबी ओवैस, अबू
ओवैस, सालेह
बिन मूसा अत-तल्ही, कसीर
बिन अब्दुल्लाह, इस्हाक
बिन इब्राहीम अल-हनैनी, अब्दुल्लाह
बिन लहीअह, सैफ़
बिन उमर अत-तमिमी और मुहम्मद बिन हमीद अर-राज़ी शामिल हैं। इन रावियों और इनकी
रिवायत को ज़ईफ़ कहने वाले उलमा में शैख़ मुक़बिल अल-वाअदीई ने अपनी किताब तहक़ीक़
अल-मुस्तद्रक अला अस-सहीहैन (हदीस 318–319) में
ज़ईफ़ कहा। इमाम
शम्सुद्दीन ज़हबी ने मीज़ानुल ए‘तिदाल (रावी नं. 3831) में
रावी सालेह
बिन मूसा को
ज़ईफ़ बताया तथा इमाम यह्या बिन मुईन, इमाम
बुख़ारी और इमाम नसाई के अक़वाल नक्ल किए, जिनमें
इसे, “मुनकरुल
हदीस” और “मतरूक” कहा गया है। इमाम
यह्या बिन मुईन ने कसीर बिन अब्दुल्लाह को
भी “ज़ईफ़ुल हदीस” कहा है। हाफ़िज़
हैसमी ने मजमउज़ ज़वाइद में
लिखा कि इस रिवायत की सनद में सालेह
बिन मूसा अत-तल्ही है
और वह ज़ईफ़ है। इमाम
इब्न हिब्बान ने अल-मजरूह़ीन (रक़म 893) में
रावी कसीर
बिन अब्दुल्लाह को
मजरूह रवियों में शामिल किया और उसके बारे में मुनकर रिवायतों का ज़िक्र किया है, और
रावी इस्माईल
बिन अबी ओवैस पर
भी एतराज़ किया है। इमाम शाफ़ई से कसीर बिन अब्दुल्लाह के बारे में यह कौल नक्ल
किया गया कि वह “झूठ के खम्बों में से एक खम्बा” है। हाफ़िज़ इब्न हजर अस्क़लानी ने तक़रीबुत
तहज़ीब (रक़म 5617) में
रावी कसीर
बिन अब्दुल्लाह को
ज़ईफ़ कहा। इसके अलावा इमाम सुयूती, इमाम
इब्न जौज़ी, इमाम
अहमद बिन हंबल और इमाम यूसुफ़ अल-मिज्ज़ी ने भी इस रिवायत की कुछ सनद और रवियों पर
कमजोरी का इज़हार किया।2
हवालाजात
1सही मुस्लिम हदीस नंबर: 6225,
2अल-मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस
नंबर: 1628, अस-सीरह
लि इब्न हिशाम अल-हिमयरी, जिल्द 2, सफ़्हा 593,अल-मुस्तद्रक
अला अस-सहीहैन, हदीस
नंबर: 318,319, 4576, 4711, मीज़ानुल
ए‘तिदाल, रक़म: 3831, जामिअ
बयानिल इल्म व फ़ज़्लिही, हदीस
नंबर: 1389, किताब
अल-मजरूह़ीन, रक़म: 893, तक़रीबुत
तहज़ीब, रक़म: 5617, अल-मुसन्नफ़
लि इब्न अबी शैबह, हदीस
नंबर: 31679 ,अल-मुअजम
अल-कबीर, हदीस
नंबर: 4921,मजमउज़ ज़वाइद, हदीस
नंबर: 784,14957,जामिअ
अत-तिर्मिज़ी, हदीस
नंबर: 3786,3788,सुनन
अद-दारिमी, हदीस
नंबर: 3316; अस-सुननुल
कुबरा लिल बैहक़ी, हदीस
नंबर: 13017; अस-सुननुल
कुबरा लिन्नसाई, हदीस
नंबर: 8148, 8175 और 8154; अल-मुसन्नफ़
इब्न अबी शैबह, हदीस
नंबर: 30081; अल-मुअजम
अल-औसत, हदीस
नंबर: 3439 और 3542; अल-बहरुज़
ज़ख्खार, हदीस
नंबर: 864; मुस्नद
अहमद, हदीस
नंबर: 11119, 11147, 11227 और 11578; अल-मुअजम
अस-सगीर, हदीस
नंबर: 363 और 376; मुस्नद
अबी यअला, हदीस
नंबर: 1021 और 1140; मुस्नद
इब्न अल-जअद, हदीस
नंबर: 2711; मुस्नद
अब्द बिन हमीद, हदीस
नंबर: 265; अल-मुअजम
अल-कबीर, हदीस
नंबर: 2679, 2680, 2681, 2683,
3052, 4922, 4923, 4969 और 4981; अस-सुन्नह
लि इब्न अबी आसिम, हदीस
नंबर: 754, 1554 और 1555; फ़ज़ाइलुस
सहाबह, हदीस
नंबर: 170, 990, 1382 और 1383; फ़ज़ाइलुस
सहाबह लिन्नसाई, हदीस
नंबर: 45; अत-तबक़ातुल
कुबरा, जिल्द 2, सफ़्हा 194 ।
-फरीद अहमद

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