इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम का मक़सद कभी ताज व तख़्त की ख़ातिर जंग करना या किसी सियासी हुकूमत को छीनना नहीं था। आपका असल मक़सद इस्लाम के पाक़ और हक़ीक़ी उसूलों की हिफ़ाज़त करना था — उस इस्लाम की जिसे खुद हुसैन के नाना रसूलुल्लाह ने अपने खून-पसीने से सींचा था। इमाम हुसैन ने अपने अमल से ये साबित कर दिया कि इस्लामी ख़िलाफ़त किसी फासिक, फाजिर और ज़ालिम शख़्स के हवाले नहीं की जा सकती, चाहे वो और उसका ख़ानदान कितना ही ताक़तवर क्यों न हो। यज़ीद जैसे बद-किरदार और ना-अहल हाकिम के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना उस वक़्त के हर मोमिन का दीनी और इख़लाक़ी फ़र्ज़ था।

जब इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम को मैदान-ए-कर्बला में बेदर्दी से शहीद कर दिया गया, तो इस ज़ुल्म का साया सिर्फ वहीं तक महदूद न रहा। इस हौलनाक जुल्म के दो साल बाद इस्लामी तारीख़ का एक और सियाह और दर्दनाक वाक़िआ वुजूद में आया — जिसे "वाक़िआ-ए-हर्रा" के नाम से जाना जाता है। यह वो वाक़िआ है जिसने मदीना मुनव्वरा जैसे मुक़द्दस शहर को खून से रंग दिया, और उम्मत को ये दिखा दिया कि जब हुकूमत जैसे नाज़ुक ओहदे पर कोई नालायक और गुमराह शख़्स बिठाया जाता है, तो वो महज़ इंसानों को नहीं — बल्कि तमाम इस्लामी क़दरों, उसूलों और मुक़द्दसात को रौंद डालता है।

यह ख़ौफ़नाक वाक़िआ सन 63 हिजरी में पेश आया — उस वक़्त जब करबला के दर्दनाक हादसे के बाद मदीना मुनव्वरा के बहादुर और दीनदार लोगों ने खुलकर यज़ीद की खिलाफ़त को मानने से इंकार कर दिया। मदीना, जो न सिर्फ रसूलुल्लाह का शहर है, बल्कि इस्लामी तहज़ीब, इमान और हया का मरकज़ भी है — वहाँ के लोगों ने यज़ीद के गुमराह और ज़ालिम नुमाइंदे उस्मान बिन मोहिब और मरवान बिन हकम जैसे को मदीना से निकाल दिया और एक नेक, तक़वापसंद शख़्स अब्दुल्लाह बिन हंजला को अपना अमीर मुन्तख़ब कर लिया।1

जब मदीना की इस इन्क़िलाबी बग़ावत की ख़बर यज़ीद तक पहुँची, तो उसने इसे कुचलने के लिए एक लश्कर रवाना किया जिसकी क़ियादत मुस्लिम बिन उक़बा नामी एक संगदिल कमांडर के हवाले की गई। यह लश्कर मदीना के बाहर “हर्रा" नामी जगह पर ठहरा, और यहीं से मदीना पर हमला शुरू किया गया। मदीना के लोगों ने पूरी हिम्मत और ईमानदारी से यज़ीदी फ़ौज का मुकाबला किया, लेकिन ताजुर्बाकार और असलाह से लैस यज़ीदी लश्कर के सामने वो ज़्यादा देर तक टिक न सके।

जब मदीना पर यज़ीदी फ़ौज को कब्ज़ा हुआ तो, रसूलुल्लाह  के शहर मदीना को तीन दिन तक लूट और तबाही के लिए खोल दिया। मस्जिद-ए-नबवी की हुरमत को पामाल किया गया, उसकी दीवारों और सहन को खून से रंग दिया गया। सैकड़ों सहाबा और ताबेईन को बेरहमी से शहीद किया गया। औरतों की इज़्ज़त लूटी गईं, यहां तक कि तारीखी रिवायतों के मुताबिक़ एक हज़ार से ज़्यादा औरतें इस वहशियाना जुल्म का शिकार बनीं, जिनसे बाद में नाजायज़ औलादें पैदा हुईं। मस्जिद नबवी की इज्ज़त को पामाल किया गया। मस्जिद नबवी में घोड़े बांधे गए और मस्जिद नबवी में 3 दिन तक नमाज़ न हो सकी।2

हाफिज़ इब्न कसीर इस वाक़िआ की तफ़्सीलात बयान करते हुए लिखते हैं:- मुस्लिम बिन उक़बा ने अपने सिपाहियों को मदीना के लोगों और यहां तक कि मस्जिद-ए-नबवी की हुरमत तोड़ने की खुली छूट दे दी। इस वहशियाना हमले में तक़रीबन 700 सहाबा और 10,000 ताबेईन को शहीद किया गया। वह इस्लामी तारीख़ के सबसे अफ़सोसनाक और शर्मनाक वाक़िआत में से एक है।3

इमाम मालिक का बयान है कि वाक़िया हर्रा के बाद मदीना में पैदा होने वाले बच्चों के हलाल होने की गारंटी नहीं रही, क्योंकि यज़ीदी फौज ने औरतों की इज़्ज़त को लूटा और सैकड़ों बलात्कार हुए, जिनसे नाजायज़ औलादें पैदा हुईं।4

तारीख़-ए-तबरी में दर्ज है कि मदीना को तीन दिन तक लूट और तबाही के लिए छोड़ दिया गया न मस्जिद की हुरमत बाक़ी रही, न औरतों की आबरू और न ही सहाबा की जान की कोई क़ीमत।5

वाक़िआ हर्रा ने इस्लाम की मुकद्दस सरज़मीन मदीना को खून और आँसुओं में डुबो दिया। यह साबित कर दिया गया कि जब इख़्तियार नालायक हाथों में सौंप दिया जाए, तो हुकूमतें सिर्फ इंसानी जानें नहीं — इमान, तहज़ीब, और दीन की रूह तक कुचल डालती हैं।

यह वो ही मदीना था और यह वो ही मदीने के लोग, जिनकी हुरमत, अफ़ज़लिय्यत और रुहानी मक़ाम के हवाले से बारहा रसूलुल्लाह ने फ़रमाया था कि जिस तरह हज़रत इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम ने मक्का मुक़र्रमा को हरम और अम्न की जगह क़रार दिया था, उसी तरह मैं मदीना के दो पत्थरीले मैदानों (लबतैन) के दरम्यान की सरज़मीन को हराम, यानी मुक़द्दस और महफूज़ ठहराता हूँ। रसूलुल्लाह ने मदीना के जानवरों, दरख्तों, बाशिंदों की हिफ़ाज़त व इज़्ज़त को इस हद तक वाज़ेह फ़रमाया कि जो कोई मदीना के खिलाफ़ ज़्यादती का इरादा रखे, उस पर अल्लाह, फ़रिश्तों और तमाम इंसानों की लानत हो। इसी तरह आपने ये भी इरशाद फ़रमाया कि मदीना हर उस शख़्स के लिए बेहतर है जिसे यह छोड़ दे; और अगर कोई इसे छोड़ जाए, तो अल्लाह तआला उसकी जगह किसी ऐसे शख़्स को लाएगा जो मदीना के लिए उससे बेहतर होगा।6

सूलुल्लाह के इन तमाम फरमानों से यह हकीकत सामने आती है कि मदीना सिर्फ एक ज़मीनी इलाक़ा नहीं, बल्कि इस्लामी तहज़ीब, रुहानियत और उम्मत के इमानी वजूद का मरकज़ है। लिहाज़ा जब ज़ालिम यज़ीद की ज़ालिम फौज ने इस पाक शहर पर हमला किया, तो दर-हकीकत उसने इस्लाम की रूह, रसूलुल्लाह की वसीयत और मदीना की हुरमत पर हमला किया।

 हवाल्जात -

1.       इब्न कसीर, अल-हाफ़िज़. अल-बिदाया वान-निहाया. दारुल फ़िक्र, बेरूत, जिल्द 8, पेज 238–239.
            तबरी, इमाम अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर. तारीख़ अल-उमम वल-मुलूक (तारीख़-ए-तबरी). दारुल कुतुब अल-इल्मिय्या, बेरूत, जिल्द 4, पेज 388.
            ज़हबी, इमाम शम्सुद्दीन. सियरे आ'लामुन्नुबला. मुअसतुर-रिसाला, बेरूत, जिल्द 4, पृष्ठ 152.
2.      इब्न कसीर, अल-हाफ़िज़. अल-बिदाया वान-निहाया. दारुल फ़िक्र, बेरूत, जिल्द 8, पृष्ठ 241.
            तबरी, इमाम अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर. तारीख़ अल-उमम वल-मुलूक (तारीख़-ए-तबरी). दारुल कुतुब अल-इल्मिय्या, बेरूत, जिल्द 4, पृष्ठ 388.
            ज़हबी, इमाम शम्सुद्दीन. सियरे आ'लामुन्नुबला. मुअसतुर-रिसाला, बेरूत, जिल्द 4, पृष्ठ 152.
3.      इब्न कसीर, अल-हाफ़िज़. अल-बिदाया वान-निहाया. दारुल फ़िक्र, बेरूत, जिल्द 8, पेज 240
4.      ज़हबी, इमाम शम्सुद्दीन. सियरे आ'लामुन्नुबला. मुअसतुर-रिसाला, बेरूत, जिल्द 4, पृष्ठ 152.
5.      तबरी, इमाम अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर. तारीख़ अल-उमम वल-मुलूक (तारीख़-ए-तबरी). दारुल कुतुब अल-इल्मिय्या, बेरूत, जिल्द 4, पेज 388.
6.       सही बुखारी हदीस नं० 1869,2889, सही मुस्लिम हदीस नं० 1362,1365,1370,1371,1381, मिश्कात उल मसाबीह हदीस नं० 2732, इब्न हजर अस्कलानी,फ़त्हुल बारी शरह सहीह अल-बुख़ारी। जिल्द 4, सफ़्हा 94 दारुल मआरिफ़, काहिरा।

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फ़रीद अहमद